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आईपीएस अधिकारी पंकज चौधरी की कलम से छलकी 'एक सिपाही की पीड़ा'

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अक्सर किसी खाकी वर्दी वाले सिपाही को देखते ही हर किसी के मन में एक अजीब सा भाव पैदा होता है, जिसका यहां जिक्र किया जाना शायद उचित नहीं होगा। क्योंकि हमारे बड़े—बूढ़े जो कहते आए हैं कि, 'पुलिस वालों की दुश्मनी भी बुरी और उनकी दोस्ती भी', ऐसे में हर किसी के मन में पुलिस के प्रति अजीब सा भाव आ ही जाता है, लेकिन क्या कोई भी पुलिस वाला किसी आम इंसान से अलग होता है? क्या उनके दो आखें, दो हाथ—पैर और किसी भी आम इंसान से अलग हटकर कुछ होता है? नहीं ना, फिर आखिर क्यों पुलिस के प्रति इस तरह के भाव हमारे मन में जागृत होते हैं? हां, ये जरूर है कि कुछ पुलिस वाले शायद उसी फितरत के होते होंगे, जैसा हमारे मन में उनके प्रति भाव उत्पन्न होता है, लेकिन बुरे इंसान तो हर किसी के बीच में होते ही हैं। फिर महज खाकी ही क्यों? सफेदपोश या फिर कोई और क्यों नहीं?

खैर, अब असल मुद्दे पर आते हैं। राजस्थान में एक ऐसे खाकी वर्दीधारी भी है, जो अक्सर उन लोगों के निशाने पर रहते आए हैं, जो या तो किसी न किसी रूप में भ्रष्ट होने के आरोप झेलते हैं या फिर इस खाकी वर्दीधारी के साथ उनकी कोई पुरानी खुन्नस हो। दरअसल, हम बात कर रहे हैं, भारतीय पुलिस सेवा 2009 बैच के अधिकारी पंकज चौधरी की, जो अक्सर अपनी बेबाक और नीडर होकर की जाने वाली बयानबाजी के लिए जाने जाते हैं। जयपुर में राजस्थान स्टेट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात पंकज चौधरी ने प्रतापगढ़ के जवान सुभाष विश्नोई के सुसाइड के प्रयास पर उत्तर प्रदेश के स्वतन्त्र पत्रकार सुशील वर्मा के साथ अपने विचार जाहिर किए हैं, जिसमें एक सिपाही की पीड़ा झलकती दिखाई देती है। आइए, जानते हैं चौधरी ने इस सिपाही के बारे में क्या कहा...


'मुझे याद है, जब मैं वर्ष 2011 में ट्रेनिंग के दौरान तत्कालीन एडीजीपी ट्रेनिंग सुधीर प्रतापजी ने आईपीएस ट्रेनिंग में 2009 बैच के 6 आईपीएस अधिकारियों को राज्य के विभिन्न पीटीएस में भेजा था। मुझे झालावाड़ पीटीएस जाने का अवसर मिला। झालावाड़ सर्किट हाऊस में ठहरना हुआ था। पहले दिन सभी ट्रेनिंग कर रहे जवानों के साथ सम्पर्क सभा में चर्चा हुई। जवानों से मैनें एक प्रश्न सभी से पुछा पुलिस की नौकरी में क्यों आये? मुझे किसी भी जवान का उत्तर संतोषप्रद नहीं लगा। इसलिए भी कि शायद पुलिस में आने का उद्देश्य स्पष्ट नहीं था। अगले दिन जवानों से अधिक संपर्क एवं उनके विचारों को जानने के लिए क्रिकेट मैच का आयोजन कराया गया, जिससे कई जवान कुछ खुले, अपनी समस्याओं एवं पुलिस में आने का मकसद बताया, जो आश्चर्यजनक था। पुन: तीसरे दिन सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन कराया गया व पुलिस के बारे में बोलने के लिए जवानों को मंच पर आमंत्रित भी किया गया।'

'इसी दौरान मैं सुभाष विश्नोई संपर्क में आया। पुन: अगले दिन सम्पर्क सभा में एक जवान ने मुझसे छुट्टी का निवेदन किया, मैने पूछा किस कारण छुट्टी चाहते हो, जबकि ट्रेनिंग में छुट्टी प्रायः नहीं मिलती है। उस जवान ने पुन: पूछने पर बताया कि साहब पटवारी की परीक्षा है, मेरा चयन वहां हो जायेगा तो अच्छा रहेगा। जवान का जवाब कई प्रश्न खड़े कर गया। पुन: एक वर्ष उपरांतं मैं बांसवाड़ा ट्रेनिंग के दौरान एडीशनल एसपी बांसवाड़ा के तौर पर उदयपुर पुलिस रेंज खेल में शामिल हुआ। मुझे वहां भी सुभाष मिला, काफी खुश था और पुलिस खेल प्रतियोगिता का आनंद भी ले रहा था। आज जब सुभाष के बारे में पता चला तो काफी निराशा हुई और यह प्रश्न पुन: सामने आया कि एक हंसता खेलता जवान, जिसे झालावाड़, उदयपुर हंसते देखा इतना निराश क्यों है? प्रतापगढ़ एसपी मानसिक बीमारी कह तात्कालिक उत्तर अवश्य दे गये, पर जब मूल में जाते हैं तो समस्या कुछ और पाते हैं, जो शनै—शनै विकराल हो गई।'

'मुझे याद है कि जब मैं दिल्ली पहली नौकरी वर्ष 2000 में करता था, तो पहली सैलरी मात्र 7,450 रुपये मिलती था। इस सैलरी में दिल्ली रहकर जीवन यापन करना कितना मुश्किल था, वो मैं ही समझ सकता था। कई तरह के क़र्ज़े हो गये, बड़ी मुश्किल से ईमानदारी से जीवन यापन होता था। इन्हीं परेशानियों ने आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। पिछले आठ वर्षों से विभिन्न जिलों कोटा, बांसवाड़ा, जैसलमेर, बूदीं, अजमेर, दिल्ली आरएसी, जयपुर एससीआरबी पदस्थापन के दौरान जवानों को करीब से जाना, जिसमें मैंने यह पाया कि 90 प्रतिशत जवान अच्छे हैं, शेष 10 प्रतिशत आपराधिक लक्षणों से युक्त होते हैं तथा भ्रष्टाचार की सारी सीमाओं को लाघतें भी है। विषय उन जवानों का है, जो स्वाभिमान एवं ईमानदारी के साथ काम करते हैं, पर वेतन विसंगति और अनियमित दिनचर्या से पीड़ित है। उनकी मांगें जायज है, समयानुसार वेतन विसंगति व पुलिस सुधार को समग्र रुप से लागु करने का वक़्त भी आ गया है।'


'राज पुलिसकर्मियों की निम्न मांग एवं सम्मान बनाये रखने पर उच्च स्तर पर विचार करना चाहिए।

  • वेतन में की जा रहे कटौती के आदेश को निरस्त करना।
  • 7वां वेतन आयोग केंद्र के अनुरूप आर्मी की तर्ज पर पुलिस को वेतन एवं भत्ते दिए जावे।
  • हार्ड ड्यूटी भत्ता 12% भाग के स्थान पर वेतन एवं DA का 50% किया जावे।
  • मैस एवं हार्ड ड्यूटी भत्ते को आयकर के दायरे से बाहर किया जावे।
  • चुनावों के दौरान समस्त पुलिस बल को चुनाव आयोग की दर से प्रतीकात्मक भत्ता दिया जावे।
  • पुलिस कांस्टेबल का न्यूनतम वेतन तृतीय श्रेणी शिक्षक के बराबर किया जावे।
  • कांस्टेबल पद के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता 12th/ बीए की जावे।
  • पुलिस कर्मियों का न्यूनतम मैस भत्ता पैरा मिलिट्री फोर्स के अनुरूप किया जावे।
  • पुलिस स्थानांतरण नीति में गृह जिले में स्थानांतरण की सीमा 15 वर्ष से घटाकर 7 वर्ष की जावे एवं संभाग में 7 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष की जावे।
  • साप्ताहिक अवकाश के विकल्प पर ध्यान दिया जाए।

उच्च स्तर पर कांस्टेबलों की मांगों पर संवेदनशील होकर विचार करना चाहिए, जिसके संदर्भ में प्रतापगढ़ में जवान सुभाष विश्नोई के साथ घटित परिस्थिति न सिर्फ़ चिंतनीय बल्कि गंभीर भी है। घटना इस प्रकार से है। प्रतापगढ़ जिले में तैनात एक पुलिसकर्मी सुभाष ने वेतन कटौती समेत अन्य मांगें जाहिर करते हुए सुसाइड नोट सोशल मीडिया पर वायरल करने के बाद आत्महत्या का प्रयास किया जाना बताया जा रहा है। 5 पेज का सुसाइड नोट सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है, जिसमें कॉन्स्टेबल ने अपनी सारी व्यथा बताई है। वहीं पुलिस की मदद के लिए आमजन को भी गुहार करते हुए भी लिखा है। हाल ही में चल रहे वेतन कटौती के मामले को भी सुसाइड नोट में लिखा बताया जा रहा है।'

'वही मीडिया रिपोर्ट की मानें तो प्रतापगढ़ पुलिस अधीक्षक ने कांस्टेबल की दिमागी स्थिति सही नहीं होने व उपचार चलने की बात कहते हुए अधिक दवा सेवन से तबियत बिगड़ने की बात कही है। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार राजस्थान पुलिस के कांस्टेबल सुभाष विश्नोई जो वर्तमान में पुलिस अधीक्षक कार्यालय प्रतापगढ़ में तैनात है। इस कांस्टेबल के नाम से एक सुसाइड नोट सोशल मीडिया पर वारयल हुआ, जिसमें उसने पुलिस सेवा के दौरान होने पुलिस कार्मिकों की परेशानियों का समाधान नहीं होने से खुद को आहत बताया। इस सुसाइड नोट में अधिकारियों और आमजन से भी अपील की है। इसके बाद कांस्टेबल की तबियत बिगड़ गई, जिसे अस्पताल पहुंचाया गया। इस मामले में जिला पुलिस अधीक्षक शिव राज मीणा ने कहा कि कांस्टेबल की तबियत कुछ समय से खराब है, मानसिक उपचार चल रहा है। रात में अधिक दवा लेने से तबियत बिगड़ गई है। वहीं सूत्र व मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक साथ ही कार्मिक द्वारा सुसाईड नोट लिखने की बात को स्वीकार किया है।'

'अंतत: मेरा मानना है कि वर्ष 1996 से माननीय उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन 'पुलिस सुधार' के संदर्भ में वर्ष 2006 व 2016 में आये आदेशों की पालना धरातल स्तर पर सुनियोजित तरीके से बेहतर सामंजस्य एंव सच्ची नियत के साथ रखते ही एेसे लाखों सिपाहियों का दर्द कम होगा व पुलिस का इकबाल न सिर्फ बुलंद होगा, बल्कि आमजन व पब्लिक के बीच का गैप भी शनै—शनै कम होगा। 
— जयहिंद जयजवान


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