'फाल्गुनी काव्य संगम' में ठहाकों से गूंज उठा सूचना केंद्र सभागार - RNews1 Hindi Khabar

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'फाल्गुनी काव्य संगम' में ठहाकों से गूंज उठा सूचना केंद्र सभागार

अजमेर। ‘नयी सभ्यता के सामने पुरानी संस्कृति हार गई है, दुल्हन तो प्रेमी के साथ कहीं भाग गई है‘ कविता के बहाने शेरवानी में सजे दूल्हे और बैंडवाले की समरूपता पर करारा व्यंग्य किया देश-विदेश में प्रसिद्ध हास्य कवि बुद्धिप्रकाश दाधीच ने। अवसर था अजयमेरू प्रेस क्लब द्वारा शुक्रवार को सूचना केंद्र सभागार में आयोजित ‘फाल्गुनी काव्य संगम‘ का।

अतिथि कवि के तौर बुद्धिप्रकाश की ‘मोबाइल से मार गई मीठा मीठा बोल, ब्याईजी जाण ब्याणजी ने कर्यो मिसकॉल‘ और ‘म्हारा आवे डील में हेरा रे, घर का पूत कँवारा डोले जजमानां के फेरा रे‘ जैसी हास्य-व्यंग्य की चुटीली रचनाएं सुनकर पूरा सभागार ठहाकों और तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज गया।

होली का अहसास कराते हास्य गीत ‘शकल देख सासू की डर ग्यो नयो जंवाई रे होली आई रे‘ श्रोता झूम उठे। रामायण, शिवपुराण और मथुरा की कृष्णलीला आधारित प्रभावी रचनाएं सुनाते हुए दाधीच ने कहा कि हास्य विसंगतियों से पैदा होता है।

काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि-कहानीकार व चित्रकार राम जैसवाल ने ‘वासन्ती मौसम फूलों की गन्ध ज्यों, कागज के फूलों की मुट्ठी में बन्द हुए‘ सुनाते हुए काव्य संगम को जीवन में जीवंत होने के उत्सव जैसा बताया। सारस्वत अतिथि वरिष्ठ गीतकार डॉ. हरीश ने चिरपरिचित गीत ‘हर गरजते मेघ में सावन नहीं है‘ गाकर सुनाया।

प्रसिद्ध गज़लगो सुरेन्द्र चतुर्वेदी ने जब ‘जवां बेटों की जब भी लाश के ताबूत आते हैं, मौहल्ले भर की माँओं का कलेजा चीख उठता है‘ मार्मिक गज़ल सुनाई तो पूरा सभागार वाह-वाह कर उठा। गीतकार डॉ. पूनम पाण्डे की शिवस्तुति और सरस्वती वंदना से प्रारंभ हुई काव्यगोष्ठी का आगाज करते हुए बाल साहित्यकार गोविन्द भारद्वाज ने ‘मेरी कविता तेरा कलाम एक ही तो है‘ सुनाकर कविधर्म का परिचय दिया।

डॉ. अनन्त भटनागर ने ‘अच्छे शासक को चाहिए सुर में सुर मिलाने वाली प्रजा‘ सुनाकर राजनीतिक हालात पर दृष्टि डाली, डॉ नवल किशोर भाभड़ा ने लीक से हटकर रोचक हास्य रचना ‘बाल की खाल‘ सुनाई। संयोजन व मंच संचालन कर रहे उमेश कुमार चौरसिया ने ‘समय नहीं है अब किसी के पास रिश्तों को महकाने का‘ कविता के द्वारा सोशल मीडीया से उत्पन्न स्थिति को दर्शाया।

संजीता कवि डॉ. रमेश अग्रवाल ने मधुर स्वर मेें गुनगुनाते हुए ‘मन के मंदिर का स्वयं मैं ही हूँ भगवान, मैं मानूं तो श्राप है मैं मानूं वरदान‘ जैसे दोहे सुनाकर मनोभावों का चित्रण किया। गीतकार गोपाल गर्ग ने नयी गजल ‘वो मुझे तडपा रहा था दूसरों से बात कर, कुछ न बोला मैं उसका दिल जलाने के लिए‘ सुनाकर खूब दाद बटोरी।

बख्शीश सिंह ने ‘वो हाथ मिलाने के बाद उंगलियां गिनने लगता है‘ ऐसी छोटी पर गहरे भाव वाली कविताएं सुनाई। प्रदीप गुप्ता ने ‘डैथ इवेंट मैनेजमेंट‘ रचना सुनाकर सबको गुदगुदाया और सुमन शर्मा ने ‘हौसलों का सम्बल मुझमें भी है‘ कविता सुनाई। गोष्ठी में कालिंदनंदिनी शर्मा, पी.के.शर्मा, देवीदास दीवाना, विपिन जैन, आनन्द शर्मा और बाल कवि आर्यन बोहरा ने भी कविताएं सुनाकर प्रभावित किया।

प्रारंभ में क्लब के पूर्व अध्यक्ष एस.पी.मित्तल, समाजसेवी नवीन सोगानी, वरिष्ठ पत्रकार नरेन्द्र चौहान और पदाधिकारी प्रताप सनकत, सुरेश कासलीवाल, सत्यनारायण झाला, अकलेश जैन, विजय हंसराजानी और सैयद सलीम ने सभी कविगण का स्वागत किया। महासचिव राजेंद्र गुंजल ने आभार अभिव्यक्त किया।



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