अब शायद ही कभी पूरी हो पाएगी गजलों की दुनिया के सरताज जगजीत सिंह की कमी - RNews1 Hindi Khabar

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अब शायद ही कभी पूरी हो पाएगी गजलों की दुनिया के सरताज जगजीत सिंह की कमी

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दुनिया में आपका सएच्चा साथी संगीत को भी कहा जाता है और इस संगीत में भी जब गजलों की बात की जाए तो फिर कहना ही क्या। जीवन की बारीकियों को छू जाने का माद्दा रखने वाले गजलें आज भी अपने असली शबाब है मानी जाती है। गजलों की जब बात आती है तो राजस्थान के मशहूर गजल गायक जगजीत सिंह का नाम सबसे पहले पायदान पर आता है। खालिस उर्दू जानने वालों की मिल्कियत समझी जाने वाली, नवाबों-रक्कासाओं की दुनिया में झनकती और शायरों की महफ़िलों में वाह-वाह की दाद पर इतराती ग़ज़लों को आम आदमी तक पहुंचाने का श्रेय अगर किसी को पहले पहल दिया जाना हो तो जगजीत सिंह का ही नाम ज़ुबां पर आता है। उनकी ग़ज़लों ने न सिर्फ़ उर्दू के कम जानकारों के बीच शेरो-शायरी की समझ में इज़ाफ़ा किया बल्कि ग़ालिब, मीर, मजाज़, जोश और फ़िराक़ जैसे शायरों से भी उनका परिचय कराया। जगजीत सिंह ने अपने करियर की शुरूआत में काफी मुश्किलों का सामना किया। ऐसा नहीं था जैसे कोई परोसी हुई थाली हो, उन्होंने अपने करियर की सही शुरूआत होने से पहले उन्होंने कई परेशानियों का सामना किया।

जगजीत जी का जन्म 8 फ़रवरी 1941 को राजस्थान में बीकानेर जिले के गंगानगर में हुआ था। उनके पिता सरदार अमरसिंह धमानी भारत सरकार के कर्मचारी थे। जगजीत सिंह का परिवार मूलतः पंजाब  (भारत)  के रोपड़ ज़िले के दल्ला गांव का रहने वाला है। मां बच्चन कौर पंजाब के ही समरल्ला के उट्टालन गांव की रहने वाली थीं। जगजीत का बचपन का नाम जगमोहन सिंह था, जिन्हें उनके घर वाले प्यार से जीत कहा करते थे। बाद में जगमोहन के जग और उनके प्यार के नाम जीत को मिलाकर ही उनका नाम जगजीत सिंह बना और इसी नाम से वे मशहूर हुए।

करोड़ों सुनने वालों के चलते सिंह जगजीत सिंह साहब कुछ ही दशकों में जग को जीतने वाले जगजीत बन गए। उनकी शुरूआती शिक्षा गंगानगर के खालसा स्कूल में हुई और बाद पढ़ने के लिए वे जालंधर आ गए। यहां डीएवी कॉलेज से स्नातक की डिग्री लेने के बाद उन्होंने कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन भी 
किया। जगजीत सिंह को बचपन मे अपने पिता से संगीत विरासत में मिला। उन्होंने गंगानगर मे ही पंडित छगनलाल शर्मा के सानिध्य में दो साल तक शास्त्रीय संगीत सीखने की शुरूआत की। आगे जाकर सैनिया घराने के उस्ताद जमाल ख़ान साहब से ख्याल, ठुमरी और ध्रुपद की बारीकियां सीखीं। पिता की ख़्वाहिश थी कि उनका बेटा भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में जाए लेकिन जगजीत पर गायक बनने की धुन सवार थी।

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान संगीत मे उनकी दिलचस्पी देखकर कुलपति प्रोफ़ेसर सूरजभान ने जगजीत सिंह को काफ़ी उत्साहित किया। उनके ही कहने पर वे 1965 में मुंबई आ गए। यहां से उनके संघर्ष का दौर शुरू हुआ। मुंबई में वे एक पेइंग गेस्ट के तौर पर रहा करते थे और विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाकर या शादी-समारोह वगैरह में गाकर रोज़ी रोटी का जुगाड़ करते रहे। 1967 में जगजीत सिंह की मुलाक़ात चित्रा जी से हुई, जिसके दो साल बाद दोनों ने 1969 में परिणय सूत्र में बंध गए।

जगजीत सिंह फ़िल्मी दुनिया में पार्श्वगायन का सपना लेकर आए थे। तब पेट पालने के लिए कॉलेज और ऊंचे लोगों की पार्टियों में अपनी पेशकश दिया करते थे। उन दिनों तलत महमूद, मोहम्मद रफ़ी साहब जैसों के गीत लोगों की पसंद हुआ करते थे। रफ़ी-किशोर-मन्नाडे जैसे महारथियों के दौर में पार्श्व गायन का मौक़ा मिलना बहुत दूर था। ऐसे में उन्होंने ग़ज़लों को जब फ़िल्मी गानों की तरह गाना शुरू किया तो आम आदमी ने ग़ज़ल में दिलचस्पी दिखानी शुरू की, लेकिन ग़ज़ल के जानकारों की भौहें टेढ़ी हो गई। ख़ासकर ग़ज़ल की दुनिया में जो मयार उस समय बेग़म अख़्तर, कुन्दनलाल सहगल, तलत महमूद, मेहदी हसन जैसों का था।। उससे हटकर जगजीत सिंह की शैली शुद्धतावादियों को रास नहीं आई।

दरअसल, यह वह दौर था, जब आम आदमी ने जगजीत सिंह, पंकज उधास सरीखे गायकों को सुनकर ही ग़ज़ल में दिल लगाना शुरू किया था। दूसरी तरफ़ परंपरागत गायकी के शौकीनों को शास्त्रीयता से हटकर नए गायकों के ये प्रयोग चुभ रहे थे। आरोप लगाया गया कि जगजीत सिंह ने ग़ज़ल की प्योरटी और मूड के साथ छेड़खानी की, लेकिन जगजीत सिंह अपनी सफ़ाई में हमेशा कहते रहे हैं कि उन्होंने प्रस्तुति में थोड़े बदलाव ज़रूर किए हैं, लेकिन लफ़्ज़ों से छेड़छाड़ बहुत कम किया है। बेशतर मौक़ों पर ग़ज़ल के कुछ भारी-भरकम शेरों को हटाकर इसे छह से सात मिनट तक समेट लिया और संगीत में डबल बास, गिटार, पिआनो का चलन शुरू किया। यह भी ध्यान देना चाहिए कि आधुनिक और पाश्चात्य वाद्ययंत्रों के इस्तेमाल में सारंगी, तबला जैसे परंपरागत साज पीछे नहीं छूटे।

प्रयोगों का सिलसिला यहीं नहीं रुका, बल्कि तबले के साथ ऑक्टोपेड, सारंगी की जगह वायलिन और हारमोनियम की जगह कीबोर्ड ने भी ली। कहकशां और फ़ेस टू फ़ेस संग्रहों में जगजीत सिंह ने अनोखा प्रयोग किया। दोनों एलबम की कुछ ग़ज़लों में कोरस का इस्तेमाल हुआ। विनोद खन्ना, डिंपल कपाड़िया अभिनीत फिल्म 'लीला' के गीत 'जाग के काटी सारी रैना' में गिटार का अद्भुत प्रयोग किया। जलाल आग़ा निर्देशित टीवी सीरियल कहकशां के इस एलबम में मजाज़ लखनवी की ‘आवारा’ नज़्म ‘ऐ ग़मे दिल क्या करूं ऐ वहशते दिल क्या करूं’ और फ़ेस टू फ़ेस में ‘दैरो-हरम में रहने वालों मयख़ारों में फूट न डालो’ बेहतरीन प्रस्तुति थीं।

जगजीत सिंह ही पहले ग़ज़ल गुलुकार थे, जिन्होंने चित्रा जी के साथ लंदन में पहली बार डिजीटल रिकॉर्डिंग करते हुए ‘बियॉन्ड टाइम' अलबम जारी किया। इतना ही नहीं, जगजीत सिंह ने क्लासिकल शायरी के अलावा साधारण शब्दों में ढली आम-आदमी की जिंदगी को भी सुर दिए। ‘अब मैं राशन की दुकानों पर नज़र आता हूं’, ‘मैं रोया परदेस में’, ‘मां सुनाओ मुझे वो कहानी’ जैसी रचनाओं ने ग़ज़ल न सुनने वालों को भी अपनी ओर खींचा। 

1982 में आई महेश भट्ट निर्देशित फिल्म ‘अर्थ’ में जगजीत सिंह ने संगीत दिया। इस फ़िल्म का हर गाना लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गया था। इसके बाद फ़िल्मों में हिट संगीत देने के सारे प्रयास बुरी तरह नाकामयाब रहे। कुछ साल पहले डिंपल कापड़िया और विनोद खन्ना अभिनीत फ़िल्म लीला का संगीत औसत दर्ज़े का रहा। ज़ाहिर है कि जगजीत सिंह ने बतौर कम्पोज़र बहुत पापड़ बेले, लेकिन वे अच्छे फ़िल्मी गाने रचने में असफल ही रहे। इसके विपरीत पार्श्वगायक जगजीत सिंह को सुनने वालों को सदा जमते रहे हैं। उनकी सहराना आवाज़ दिल की गहराइयों में ऐसे उतरती रही, मानो गाने और सुनने वाले दोनों के दिल एक हो गए हों। इसके साथ ही जगजीत सिंह गजल गायकी की दुनिया में ऊंचाइयों की ओर बढ़ते चले गए और गजलों की दुनिया के सरताज बन गए। इसके बाद उन्होंने कई म्यूजिक एलबम, गजल एलबम, पंजाबी एलबम, भक्ति एलबम और फिल्मों में भी अपने सुरमई आवाज का जादू चलाया, जो आज भी लोगों के दिलोदिमाग में अपना असर बनाए हुए है।

गजल के बादशाह कहे जाने वाले जगजीत सिंह का 10 अक्टूबर 2011 की सुबह 8 बजे मुंबई में देहांत हो गया। उन्हें ब्रेन हैमरेज होने के कारण 23 सितम्बर को मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। ब्रेन हैमरेज होने के बाद जगजीत सिंह की सर्जरी की गई, जिसके बाद से ही उनकी हालत गंभीर बनी हुई थी। वे तबसे आईसीयू वॉर्ड में ही भर्ती थे। जिस दिन उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ, उस दिन वे सुप्रसिद्ध गजल गायक गुलाम अली के साथ एक शो की तैयारी कर रहे थे।

जगजीत सिंह को गजलों की दुनिया का सिरमूर माना जाता है। हालांकि आज वो हमारे बीच में नहीं रहे, लेकिन उनकी गायी हुई गजलें उन्हें आज भी हमें अपने आस पास ही होने का अहसास कराती है। लेकिन सच्चाई ये भी है कि आसमान में चमकते सबसे तेज तारे और गजलों की दुनिया के सरताज जगजीत सिंह की जगह अब शायद ही कभी भर पाए।




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