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...तो फिर ऐसे में कैसे कहा जा सकता है सिंधियों को पाकिस्तानी? 10 अप्रैल को उठेगा यही सवाल

देश को आजाद हुए 70 बरस हो गए हैं और उतना ही समय सिंधियों को सिंध छोड़े हो गया। सिंधियों की जो पीढ़ी बंटवारे के दौरान इस पार आई थी, उसमें से ज्यादातर अब इस दुनिया में नहीं हैं। बचे-खुचे कुछ बूढ़ों की धुंधली यादों के सिवा अब सिंध सिर्फ हमारे राष्ट्रगान में रह गया है। इन 70 सालों में हमें यह एहसास ही नहीं हुआ कि हमने सिंध को खो दिया है। इस बीच सिंधियों की दो पीढ़ियां आ गई है, लेकिन सिंध और सिंधियों के पलायन के बारे में हम अब भी ज्यादा कुछ नहीं जानते। बंटवारे का सबसे ज्यादा असर जिन तीन कौमों पर पड़ा उनमें पंजाबी, बंगाली और सिंधी थे, मगर बंटवारे का सारा साहित्य, फिल्में और तस्वीरें पंजाब और बंगाल की कहानियां से भरी है। मंटो के अफसानों से भीष्म साहनी की 'तमस' तक बंटवारे के साहित्य मे पंजाब और बंगाल की कहानियां हैं, जबकि सिंध उनमें कहीं नहीं है।

पंजाबी और बंगालियों के मुकाबले सिंधियों का विस्थापन अलग था। पंजाब का बंटवारा एक बड़े सूबे के बीच एक लकीर खींचकर दो हिस्सों में बांटकर किया गया था। सरहद के दोनों तरफ भाषा, खान—पान और जीने के तौर—तरीके एक से थे, पर सिंधियों के प्रांत का विभाजन नहीं हुआ। तब इस बात के क्या कारण रहे होंगे, क्या नहीं रहे होंगे, वह अपने आप में आज तक एक रहस्य है। परन्तु अपने कर्म पर भरोसा करने वाले समाज ने कभी भी सिंध के बंटवारे की मांग नहीं उठायी।

यह बात हैरान करती है कि देश के साहित्यकारों इतिहासकारों ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि बंगाल और पंजाब की तरह सिंध का विभाजन क्यों नहीं हुआ? क्यों 12 लाख से भी ज्यादा सिंधियों को देशभर में बिखर जाना पड़ा? अगर विभाजन का आधार धर्म था, तो सिंध तो पश्चिम की तरफ हिंदू धर्म का आखिरी छोर माना जाता है। वह सिंध जहां के राजा दहिरसेन अंतिम हिंदू सम्राट माने जाते हैं। सिन्धी समाज के त्याग और अपनी जन्म भूमि त्यागने के बारे में किसी भी गैर सिन्धी इतिहासकार ने कभी सिन्धी समाज का यह दर्द अपनी कलम से नहीं लिखा।


सिन्धी लेखिका नंदिता भावनानी अपनी किताब 'मेकिंग ऑफ एग्जाइल' में लिखती हैं, "3 जून 1947 को माउंटबैटन ने भारत की आजादी की घोषणा की, तब बिहार, दिल्ली, लाहौर, कलकत्ता समेत तमाम जगहों पर कौमी दंगे चल रहे थे, पर सिंध लगातार शांत बना रहा। इसकी वजह सिंधियों का सूफी स्वभाव था। सिंधु नदी के  पानी में शायद मोहब्बत की तासीर ही है, जो किसी भी तरह के खूनी संघर्ष के बारे में सिंधियों को हिंसा नहीं करने देती है।

आज शायद सिन्धी समाज के इसी सूफी स्वभाव को समाज की कमजोरी समझा जा रहा है। स्वाभिमानवश आज तक आरक्षण या अपने राज्य की मांग न करने वाले सिन्धी समाज के विरुद्ध ऐसी—ऐसी बातें इन दिनों सुनने को मिलती है, जो कि किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हैं। कुछ रोज पहले एक सांसद का यह बयान कि सिंध शब्द को राष्ट्र गान से ही हटा देना चाहिए, क्योंकि सिंध इस देश का हिस्सा नहीं रहा है। सिंधियों के त्याग का उपहास नहीं  है तो और क्या है?

एक ताज़ा उद्धरण के तौर पर छत्तीसगढ़ राज्य के दुर्ग जिले में 24 मार्च 2018 को सुमित बडानी नामक एक युवक को सरेआम बीच बाज़ार हथकड़ी और लोहे की ज़ंजीर पहनाकर घुमाया गया और सार्वजनिक रूप से पुलिस द्वारा अपमानित किया गया। जिसका दोष मात्र यह था कि सड़क पर वाहन चलाते वक़्त एक स्थानीय पत्रकार की गाड़ी आकर उस युवक की गाड़ी से भीड़ गई। तथाकथित स्थानीय पत्रकार राजेन्द्र ठाकुर ने इस बात पर उस युवक और उसके भाई गगन बडानी की जमकर पिटाई की और संघर्ष के दौरान उस पत्रकार को भी चोटें आईं। उस पर पत्रकारिता जैसे पावन पेशे का भरपूर दुरूपयोग करते हुए दुर्ग पुलिस पर अनैतिक दबाव बनाया गया और पुलिस द्वारा एकतरफा कार्यवाही करते हुए उस युवक के आत्मसमर्पण कर देने पर भी उसे हाथों में हथकड़ी डालकर सरे बाज़ार एक जघन्य अपराधी की तरह घुमाया गया।


इतने पर ही उस तथाकथित स्थानीय पत्रकार की बदले की प्यास नहीं बुझी, तो उस पत्रकार ने बाकायदा स्थानीय अखबार में सिन्धी समाज को पाकिस्तानी तक लिख दिया जो कि किसी भी रूप में सिन्धी समाज को स्वीकार्य नहीं है। पूरे देश के सिन्धी समाज में इस बात को लेकर गहरा रोष व्याप्त है और देशभर के सिन्धी अपने आप को पाकिस्तानी जैसी घृणित उपाधि से नवाजे से अपमानित महसूस कर रहे हैं। इस अपमान की वजह से उपजे रोष का शांतिपूर्वक विरोध दर्ज करवाने के लिए प्रदर्शन करने की मंशा रखते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार से उस पुलिस अधिकारी के निलंबन की कार्यवाही करने और राजेन्द्र ठाकुर के अधीस्वीकरण को रद्द करने की मांग करते हैं, ताकि भविष्य में ऐसी कोई घटना दोहराई न जाए।

इसी क्रम में पूरे देशभर के सिन्धी समाज के प्रतिनिधि अपने अपने शहर में जिला कलेक्टर के माध्यम से राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नाम दिनांक 10 अप्रैल 2018 को ज्ञापन देंगे। अजमेर जिले में दीपक हासानी, मोहन चेलानी, रमेश टिलवानी, नरेश राघानी, जोधा टेकचन्दानी, हरीश खेमानी, आशकरण केसवानी, नारायण नागरानी, इन्दर विन्जानी, गोपालदास श्यामनानी, निशा जेसवानी, विमला नागरानी, सुनीता चांदवानी, चन्द्र केसवानी, राजेश बसंतानी, इश्वर टहलयानि, राजेश जुरानी, इन्दर पिन्जानी, काश बच्चानी, तीर्थ विजारिया, गोपालदास तेजवानी, लक्ष्मी आनंद समेत कई लोग सिन्धी समाज की इस मुहीम को साकार रूप देंगे।
— डॉ. लाल थडाणी


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