प्रसार भारती की डीडी फ्री डिश सर्विस को करना पड़ रहा 'परेशानी' का सामना - RNews1 Hindi Khabar

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प्रसार भारती की डीडी फ्री डिश सर्विस को करना पड़ रहा 'परेशानी' का सामना

जयपुर 17 मई । प्रसार भारती की लम्बे समय से चल रही डीडी फ्री डिश सर्विस, जो न केवल राजस्व का महत्वपूर्ण स्रोत है, बल्कि समाज का अभिन्न हिस्सा भी बन चुकी है, उसे बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। पाया गया है कि कुछ ज़ी चैनल, डिश टीवी नेटवर्क और डीडी फ्री डिश नेटवर्क के बीच सैटेलाईट्स की नज़दीकी के चलते डीडी फ्री डिश नेटवर्क का चुपके से फायदा उठा रहे हैं, जिससे प्रसार भारती की साख पर सवालिया निशान लग गए हैं। वास्तव में ज़ी यूपी/ यूके और ज़ी कलक जैसे कुछ ज़ी चैनल सैटेलाईट की निकटता का गलत फायदा उठा रहे हैं।

इससे ज़ी को अन्य प्रतिस्पर्धी प्रसारकों की तुलना में गैर-निष्पक्ष फायदा मिल रहा है- गौरतलब है कि कुछ प्रसारक बेहद प्रतिस्पर्धी बोली पर इन सेवाओं के लिए बहुत ज़्यादा कीमतें चुका रहे हैं। यह प्रसार भारती और सरकार के राजस्व के लिए भी बड़ा झटका है। दुर्भाग्य से, सरकार, विनियामक और प्रसार भारती ने सभी प्रसारकों की शिकायतों के लिए आंखें मूंद ली हैं, उनकी चुप्पी इस कृत्य के लिए सहमति को दर्शाती है।

इस स्थिति का एक और चैंका देने वाला पहलु यह है कि उत्तरप्रदेश और उत्तराखण्ड के टीवी बाज़ार पर डीडीएफडी का प्रभुत्व है। ऐसे में टीवी चैनल के परिप्रेक्ष्य से बात करें तो यह डीडीएफडी के समक्ष प्रतिस्पर्धा के अनुरूप नहीं है। इसके अलावा आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार उत्तरप्रदेश और उत्तराखण्ड के क्षेत्रीय हिंदी समाचार के दायरे में, कोई भी अन्य चैनल डीडीएफडी पर मौजूद नहीं है। हालांकि अनअधिकारिक रूप से डीडीएफडी सैटेलाईट की नज़दीकी के चलते ज़ी यूपी/ यूके (ज़ी के क्षेत्रीय समकक्ष) डीडीएफडी प्लेटफाॅर्म की वर्चुअल मौजूदगी का लाभ उठा रहे हैं, और राज्य के लाखों लोगों तक अनाधिकारिक रूप से पहुंच रहे हैं। 

wk'14'20 के लिए BARC आंकड़ों के अनुसार (जिनका विवरण नीचे दिया गया है) ज़ी यूपी/ यूके असामान्य रूप से टाॅप 2 चैनलों की तुलना में बाज़ार में उच्च स्थिति पर हैं, जिनमें से प्रत्येक ज़ी यूपी/यूके की तुलना में अधिक वितरण प्लेटफाॅर्म्स पर मौजूद है। हैरानी की बात यह है कि प्रसार भारती अपने प्लेटफाॅर्म पर अवैध कब्ज़े और राजस्व के नुकसान की अनुमति दी रहा है। गौरतलब है कि हर साल डीडीएफडी की बोली में कुछ आवेदन सीमित स्लाॅट के चलते निरस्त कर दिए जाते हैं- जबकि ये आवेदन एक साल के स्लाॅट में करोड़़ों खर्च करने के लिए तैयार रहते हैं। यह उल्लेखनीय है कि जहां एक ओर अधिकारी अधिकतम राजस्व के लिए बोली लगाते हैं, वहीं दूसरी ओर हर साल करोड़ों के नुकसान की अनदेखी कर देते हैं।

प्रसार भारती की ओर से चुप्पी : अन्य चैनलों के द्वारा बार-बार शिकायत किए जाने के बाद भी इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। ऐसे में यह स्थिति पूरी तरह से गैर-निष्पक्ष एवं गैर-कानूनी कृत्यों की ओर इशारा करती है, जिससे प्रसार भारती के राजस्व और अन्य प्रतिस्पर्धी प्रसारकों दोनों को नुकसान हो रहा है।

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